Wednesday , April 24 2019
Loading...
Breaking News

इस बात पर जस्टिस एके सीकरी बोले

न्यायमूर्ति एके सीकरी ने रविवार को बोला कि न्यायिक प्रक्रिया दबाव में है  किसी मामले पर सुनवाई प्रारम्भ होने से पहले ही लोग बहस करने लग जाते हैं कि इसका निर्णय क्या आना चाहिए इसका न्यायाधीशों पर असर पड़ता है न्यायमूर्ति सीकरी ने लॉएशिया के पहले सम्मेलन में ”डिजिटल युग में प्रेस की स्वतंत्रता” विषय पर चर्चा को संबोधित करते हुए बोला कि प्रेस की स्वतंत्रता नागरिक  मानवाधिकार की रूप-रेखा  कसौटी को बदल रही है  मीडिया ट्रायल का मौजूदा रुझान उसकी एक मिसाल है

उन्होंने कहा, ”मीडिया ट्रायल पहले भी होते थे लेकिन आज जो हो रहा है वह यह कि जैसे की कोई मुद्दा बुलंद किया जाता है, एक याचिका दायर कर दी जाती है इस (याचिका) पर सुनवाई प्रारम्भ होने से पहले ही लोग यह चर्चा प्रारम्भ कर देते हैं कि इसका निर्णय क्या होना चाहिए यह नहीं कि निर्णय क्या ‘है’, (बल्कि) निर्णय क्या होना चाहिए  मेरा तजुर्बा है कि न्यायाधीश कैसे किसी मामले का निर्णय करता है, इसका इस पर असर पड़ता है ”

न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा, ”यह सुप्रीम न्यायालय में ज्यादा नहीं है क्योंकि जब तक वे सुप्रीम न्यायालय में पहुंचते हैं वे बहुत ज्यादा परिपक्व हो जाते हैं  वे जानते हैं कि मीडिया में चाहे जो भी हो रहा है उन्हें कानून के आधार पर मामले का निर्णय कैसे करना है आज न्यायिक प्रक्रिया दबाव में है ”

उन्होंने कहा, ”कुछ वर्ष पहले यह धारणा थी कि चाहे सुप्रीम न्यायालय हो, न्यायालय हों या कोई निचली अदालत, एक बार न्यायालय ने निर्णय सुना दिया तो आपको निर्णय की आलोचना करने का पूरा अधिकार है अब जो न्यायाधीश निर्णय सुनाते हैं, उनको भी बदनाम किया जाता है या उनके विरूद्ध मानहानिकारक सम्बोधन दिया जाता है ” सम्मेलन को संबोधित करने वालों में शामिल अलावा सालिसिटर जनरल माधवी गोराडिया दीवान ने भी इसी तरह के विचार पेश किए उन्होंने बोला कि समाचार  फर्जी खबर, समाचार  विचार, नागरिक  पत्रकार के बीच का फर्क धुंधला हो गया है उन्होंने बोला कि एक चुनौती यह भी हो गई है कि एडवोकेट भी कार्यकर्ता बन गए हैं

loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *