Thursday , February 21 2019
Loading...

न्यायालय के निर्णय की आलोचना का है पूरा अधिकार

सुप्रीम न्यायालय के जस्टिस एके सीकरी का कहना है कि डिजिटल युग में न्याय करना ‘तनाव भरा’ कार्य है. किसी भी मामले की न्यायालय में सुनवाई प्रारम्भ होने से पहले ही लोग सोशल मीडिया पर बहस करने लगते हैं कि इसका क्या निर्णय आना चाहिए? इसका जजों पर प्रभाव पड़ता है. 

जस्टिस सीकरी ने लॉ एसोसिएशन फॉर एशिया एंड द पैसिफिक (लॉएशिया) के पहले सम्मेलन में ‘डिजिटल युग में प्रेस की स्वतंत्रता’ पर बोलते हुए रविवार को बोला कि प्रेस की स्वतंत्रता नागरिक और मानवाधिकार की रूपरेखा  कसौटी बदल रही है. मीडिया ट्रायल का मौजूदा रुझान इसकी मिसाल है. पहले भी मीडिया ट्रायल होता था, लेकिन आज याचिका दायर होते ही लोग निर्णय को लेकर बहस करने लगते हैं. लोग बताने लगते हैं कि निर्णय क्या होना चाहिए.

जस्टिस सीकरी ने कहा, उनका खुद का अनुभव है कि जज पर इसका असर पड़ता है. हालांकि, सुप्रीम न्यायालय तक पहुंचते-पहुंचते जज बहुत ज्यादा परिपक्व हो जाते हैं. उन्हें पता होता है कि मीडिया में कुछ भी होता रहे, उन्हें कानून के आधार पर निर्णय कैसे करना है.

जस्टिस सीकरी के मुताबिक, कुछ वर्ष पहले तक धारणा थी कि लोगों को सुप्रीम कोर्ट, न्यायालय या निचली न्यायालय के निर्णय की आलोचना का पूरा अधिकार है. अब लोग निर्णयसुनाने वाले जज को भी बदनाम करते हैं. यहां तक कि उनके विरूद्ध आपत्तिजनक बयानबाजी की जाती है.

loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *